पिथौरागढ़ ऑलवेदर रोड की प्रोजेक्ट हकीकत में यात्रियों के लिए मुसीबत बन गया

ऑलवेदर रोड पिथौरागढ़-टनकपुर की अवधारणा

  • पिथौरागढ़-टनकपुर के बीच बन रही ऑलवेदर रोड की अवधारणा ही सवालों के घेरे में आ गई है। किसी भी मौसम में बंद नहीं होने के दावे के साथ शुरू की गई थी।
  • करीब एक हजार करोड़ रुपये से अधिक का यह प्रोजेक्ट हकीकत में यात्रियों के लिए मुसीबत बन गया है।
  • सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि यह महत्वाकांक्षी सड़क मलबा आने से साल में 182 बार बंद हुई। सड़क बंद होने से कई बार यात्रियों को 18-18 घंटे तक परेशानी झेलनी पड़ी।
  • सड़क बंद होने से सड़क पर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं।  

हाईवे की हकीकत दावों से उलट है

  • सीमांत पिथौरागढ़ से चीन और नेपाल की सीमा लगी है। ऐसे में सामरिक महत्व को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2016 में 150 किलोमीटर नेशनल हाईवे को ऑलवेदर रोड में तब्दील करने के लिए करीब 1078 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी।
  • उस वक्त दावा किया गया था कि निर्माण पूरा होने के बाद टनकपुर से पिथौरागढ़ महज चार से पांच घंटे में पहुंचा जा सकेगा। वर्ष 2017 में इस एनएच पर जगह-जगह पहाड़ियों को काटकर इस खास रोड का निर्माण शुरू हुआ।
  • इसके चलते यहां से गुजरने वालों को करीब दो साल तक भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। फिर भी लोगों को संतोष था कि ऑलवेदर रोड पूरी होने के बाद सड़क पूरे साल निर्बाध चलती रहेगी जिससे पिथौरागढ़ और चम्पावत जिलों को बड़ी राहत मिलेगी।
  • लेकिन चम्पावत जिला आपदा कंट्रोल रूम के आंकड़े बताते हैं कि इसी साल जनवरी से अब तक यह सड़क 182 बार बंद हो चुकी है। कई बार तो यह हाईवे दो-तीन दिन तक भी बंद रहा है।

पहाड़ियों का ट्रीटमेंट भी नहीं रहा कारगर

  • चम्पावत में पहले से डेंजर जोन घोषित पहाड़ों का रॉक ट्रीटमेंट भी खासतौर पर ऑलवेदर रोड परियोजना में शामिल था। जिले में 12 से ज्यादा जगह रॉक ट्रीटमेंट किया भी गया।
  • इसके तहत डेंजर जोन की पहाड़ियों में भीतर ड्रिल करने के बाद उसमें लोहे के मोटे सरिये डाले और उनका जाल सा बांधा गया है लेकिन कुछ स्थानों पर ट्रीटमेंट के बाद भी पहाड़ी दरकीं या दरक रही हैं।
  • इस संबंध में एनएच खंड के अधिशासी अभियंता एलडी मथेला ने बताया कि भू-गर्भ वैज्ञानिकों से पहाड़ियों का सर्वे कराया गया है, जिसकी रिपोर्ट आनी है। भूगर्भ विज्ञानियों की सलाह के आधार पर आगे इन पहाड़ियों का प्रॉपर ट्रीटमेंट किया जाएगा।

उभर आए डेंजर जोन  हाईवे पर

  • ऑलवेदर रोड की चौड़ाई 36 फीट रखी है। चौड़ाई ज्यादा करने का मकसद था कि यदि पहाड़ी से मलबा भी आ जाए, तो सड़क का काफी हिस्सा सुचारू रहेगा, जिससे यातायात नहीं रुकेगा पर हुआ उलट।
  • इस एनएच पर दरकते पहाड़, हाईवे के पूरे हिस्से पर भारी पड़ रहे हैं। चम्पावत में डेंजर प्वाइंट बने स्वाला और अमोड़ी के आसपास मलबे की चपेट में आकर तैयार ऑलवेदर रोड भी जमींदोज हो चुकी है।
  • टनकपुर-पिथौरागढ़ हाईवे पर पहले सिर्फ बनलेख से चार किलोमीटर दूर स्वाला, बेलखेत, बाराकोट, घाट और गुरना में चट्टानें दरकती थीं। ऑलवेदर रोड बनने के बाद यहां 12 से अधिक नए डेंजर जोन और उभर आए हैं। 
  • इन चट्टानों में कई जगह बड़े-बड़े भ्रंश हैं। टनकपुर से घाट तक पहाड़ियों में कई स्थानों पर मेन फ्रंटल फॉल्ट और मेन बाउंड्री फॉल्ट हैं। रोड कटने से पहाड़ी पर दबाव बढ़ता है। ढलान अस्थिर होने के कारण नई सड़कों पर अक्सर भूस्खलन होता रहता है। ये प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रहेगी। ढलान स्थिर होने पर इन सड़कों पर भविष्य में भूस्खलन कम हो सकता है पर पूरी तरह बंद नहीं होगा। ये सतत प्रक्रिया है।