सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने दे दी

सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को अनुमति दे दी है. इसमें संसद की नई इमारत भी शामिल है. तीन जजों की बेंच ने 2-1 के बहुमत से यह फ़ैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से भविष्य की परियोजवनाओं में स्मॉग टावर लगाने के लिए कहा है. ख़ास करके उन शहरों में जहाँ प्रदूषण गंभीर मसला है. सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट में पर्यावरण से जुड़ी मंज़ूरियों को भी स्वीकार कर लिया है और ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव की अधिसूचना को भी हरी झंडी दे दी है.

मौजूदा सेंट्रल विस्टा एक ऐतिहासिक इलाक़ा है जिसे देखने लोग दूर-दराज़ से आते हैं और ख़ूबसूरती के साथ-साथ भारत की सत्ता के गलियारे भी यहीं रहे हैं. यहां एक नए संसद भवन समेत राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट के बीच कई इमारतों के निर्माण की योजना है.

कोर्ट ने सरकार के रुख़ को ‘आक्रामक’ बताया

सेंट्रल विस्टा को नई शक़्ल देने की शुरुआत संसद से होगी और नई इमारत में तक़रीबन 971 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे.

वैसे संसद में जगह बढ़ाने की मांग पिछले 50 वर्षों से ज़्यादा से उठती रही है और पिछली यूपीए सरकार में लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार के कार्यकाल में भी इस पर बहस हुई थी. सरकार ने पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए जगह की कमी का हवाला भी दिया था.

प्रस्तावित संसद भवन के तैयार होने की तारीख़ साल 2024 है लेकिन एक बड़े सवाल के साथ कि क्या सुप्रीम कोर्ट इसे बनाने की इजाज़त देगा? जहाँ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सभी की राय और तरीक़ों को शामिल करने का भरोसा दिलाया है वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने संसद के निर्माण पर सरकार के रुख़ को ‘आक्रामक’ बताया है.

सुप्रीम कोर्ट में सेंट्रल विस्टा के ख़िलाफ़ जाने वाले याचिकाकर्ता और वरिष्ठ आर्किटेक्ट नारायण मूर्ति ने बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत में कहा कि, “जिस तरह से ये प्रोजेक्ट चल रहा है, ये हमारी सारी प्रक्रियाओं और संस्थाओं की उपेक्षा कर रहा है.”

उन्होंने बताया, “मेरे और आपके लिए, एक एफ़एआर होती है जो बताती है कि हम एक प्लॉट पर कितना बना सकते हैं. अगर हम दस वर्ग मीटर भी ज़्यादा बना लें तो उसकी इजाज़त नहीं है और एमसीडी की टीम आकर उसको तोड़ देती है. लेकिन जितनी ऊंचाई की अनुमति है, अगर सरकार ही उसका डेढ़ गुना, जितनी एफ़एआर में अनुमति है उसका डेढ़ गुना बना रही है तो ये देश के लिए क्या सीख है. क्या इसका मतलब है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस?”

क्या कहती है सरकार

  • वहीं केंद्र सरकार का दावा है कि परियोजना ‘राष्ट्र हित’ में है क्योंकि सेंट्रल विस्टा के आधुनिक होने की ज़रूरत है जिससे सैकड़ों करोड़ रुपए भी बचेंगे और नई इमारतें ज़्यादा मज़बूत और भूकंपरोधी बनेंगी.
  • रहा सवाल इस हरे-भरे और खुले इलाक़े में ज़्यादा इमारतें बनाने का तो सरकार का कहना है कि वो इसमें ज़्यादा हरियाली लाने वाली है. लेकिन विरोध के ज़्यादा स्वर पर्यावरण को लेकर ही उठे हैं.

भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार के इस कई सौ करोड़ के प्रोजेक्ट का बचाव किया है. उन्होंने कहा है कि मौजूदा संसद की इमारत क़रीब 100 साल पुरानी है. इस पर ज्यादा दबाव है. नई संसद बनाते वक़्त इस इमारत की एक भी ईंट नहीं निकाली जाएगी.

  • उन्होंने कहा कि मौजूदा संसद की इमारत 1927 में बनी थी और अब यह बहुत पुरानी पड़ चुकी है. इसमें अब सुरक्षा संबंधी समस्याएँ हैं. जगह की कमी है. ये इमारत भूकंपरोधी भी नहीं है. इसमें आग लगने से बचाव संबंधी सुरक्षा मापदंडों का भी अभाव है.
  • नई योजना के तहत संसद की नई इमारत के अलावा केंद्रीय सचिवालय और कई मंत्रालयों की इमारत बनाई जाएंगी.
  • उन्होंने यह भी कहा कि फिर से इन इमारतों को बनाने की योजना से पहले पर्याप्त रूप से विचार-विमर्श किया गया है और इसके व्यावहारिक पक्ष को भी ध्यान में रखा गया है.
  • उन्होंने बताया कि इससे सालाना ख़र्च होने वाले 1000 करोड़ रुपये की बचत होगी और मंत्रालयों के बीच आपसी समन्वय में सुधार आएगा क्योंकि 10 नई इमारतों में शिफ्ट हुए ये मंत्रालय आपस में बेहतर तरीक़े से मेट्रो से जुड़े होंगे.
  • तुषार मेहता ने यह भी कहा कि सरकार के कामकाज में सुधार लाने के लिए यह ज़रूरी है कि सभी केंद्रीय मंत्रालय एक जगह पर हों. इसलिए इस योजना की ज़रूरत है.